एनएसजी में भारत की सदस्यता के मुद्दे पर चीन नापाक चाल चल रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि सैद्धांतिक तौर एनएसजी में भारत को शामिल किए जाने पर आपत्ति नहीं है। लेकिन नियम-कानून को दरकिनार कैसे किया जा सकता है। एनएसजी में शामिल होने के लिए अगर एनपीटी पर हस्ताक्षर करना जरूरी है, तो भारत को छूट कैसे दी जा सकती है। अगर एनपीटी के बगैर भारत को एनएसजी में दाखिला मिलता है, तो पाकिस्तान के दावे को कैसे ठुकरा सकते हैं। इस बीच 24 जून को सियोल में होने वाली मीटिंग के लिए विदेश सचिव एस जयशंकर रवाना हो चुके हैं।
भारत की निगाह दो अहम बिंदुओं पर टिकी हुई है। चीन की इस चाल के बाद अमेरिका का रुख क्या होता है। इसके अलावा उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक महत्वपूर्ण है। जानकारों का मानना है कि चीन के इस रवैये के बाद कई देश बीच के रास्ते का सुझाव दे रहे हैं। कुछ देशों को लगता है कि अगर किसी तरह की अड़चन आती है तो एनएसजी में भारत की सदस्यता का मामला कई वर्षों के लिए टल जाएगा। हालांकि इन सबके बीच भारत अपनी कानूनी प्रतिबद्धताओं, ऊर्जा की जरुरतों का हवाला देकर नए नियम कानून पर जोर दे सकता है। एनएसजी के सदस्यों में गैर एनपीटी सदस्यों को शामिल करने पर राय बंटी हुई है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें